Ram Raksha Stotra Full Lyrics – Anuradha Paudwal | Sanskrit, Hindi & Meaning

जब जीवन में भय, संकट या अनिश्चितता घेर ले, तब सदियों से एक ही कवच भक्तों की रक्षा करता आया है — "श्री राम रक्षा स्तोत्र"। ऋषि बुधकौशिक द्वारा रचित यह स्तोत्र स्वयं भगवान शिव ने स्वप्न में उन्हें सुनाया था, और जागने पर बुधकौशिक ने इसे वैसा ही लिख दिया। Anuradha Paudwal की भावपूर्ण आवाज़ में यह पूर्ण स्तोत्र भगवान श्रीराम के हर अंग, हर नाम और हर रूप को कवच की तरह भक्त के चारों ओर स्थापित करता है — सिर से लेकर पैर तक, हर संकट से रक्षा का वचन।
🙏 जय श्री राम! श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु! 🏹
🎵 SONG DETAILS

Stotra — Shri Ram Raksha Stotra
Singer — Anuradha Paudwal
Rachayita (Composer) — Rishi Budhakaushika
Devata — Sita-Ramachandra
Chhand — Anushtup
Label — T-Series Bhakti Sagar
Shri Ram Raksha Stotra Lyrics - Anuradha Paudwal

यह पूरा स्तोत्र संस्कृत में है, इसलिए हर श्लोक को मूल संस्कृत, उच्चारण (रोमन लिप्यंतरण) और हिंदी अर्थ के साथ नीचे दिया गया है — जिससे पाठ करना और समझना दोनों आसान हो।

विनियोग एवं ध्यान

श्रीगणेशायनमः। अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य। बुधकौशिक ऋषिः। श्रीसीतारामचंद्रो देवता। अनुष्टुप् छन्दः। सीता शक्तिः। श्रीमद्हनुमान् कीलकम्। श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
Shreeganeshaayanamah. Asya Shree-Raama-raksha-stotra-mantrasya. Budhakaushika rishih. Shree-Seetaaraamachandro devataa. Anushtup chhandah. Seetaa shaktih. Shreemad-Hanumaan keelakam. Shree-Seetaaraamachandra-preetyarthe jape viniyogah.
अर्थ: इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता बुधकौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद है, सीता शक्ति हैं, हनुमानजी कीलक हैं तथा श्रीरामचंद्रजी की प्रसन्नता के लिए इस स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता है।

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं। पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्॥ वामाङ्कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं। नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्॥
Dhyaayed-aajaanu-baahum dhrita-shara-dhanusham baddha-padmaasana-stham, Peetam vaaso-vasanam nava-kamala-dala-spardhi-netram prasannam. Vaamaankaarudha-Seetaa mukha-kamala-milal-lochanam neeradaabham, Naanaa-alankaara-deeptam dadhatam-uru-jataa-mandanam Raamachandram.
अर्थ: जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं, पीतांबर पहने हैं, जिनके नेत्र नए कमल दल से स्पर्धा करते हैं, जो बायीं ओर स्थित सीताजी के मुख-कमल से मिले हुए हैं — उन मेघश्याम, अलंकारों से विभूषित, जटाधारी श्रीरामचंद्र का ध्यान करें।
॥ स्तोत्र माहात्म्य ॥
रघुनाथजी का चरित्र इतना विशाल है कि उसका एक-एक अक्षर बड़े से बड़े पाप को नष्ट करने में समर्थ है — यही इस स्तोत्र के आरंभ का संकल्प है।

श्री राम रक्षा स्तोत्र — श्लोक १ से १० (सिर से चरण तक कवच)

१. चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥
Charitam Raghunaathasya shata-koti-pravistaram, Ekaikam-aksharam pumsaam mahaa-paataka-naashanam.
अर्थ: श्री रघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला है। उसका एक-एक अक्षर बड़े से बड़े पापों को नष्ट करने वाला है।

२. ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्। जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥
Dhyaatvaa neelotpala-shyaamam Raamam raajeeva-lochanam, Jaanakee-Lakshmanopetam jataa-mukuta-manditam.
अर्थ: नीले कमल के समान श्याम वर्ण, कमल-नेत्र, जटाओं के मुकुट से सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित भगवान श्रीराम का स्मरण करके...

३. सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्। स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्॥
Saasi-toona-dhanur-baana-paanim naktam-charaantakam, Sva-leelayaa jagat-traatum-aavirbhootam-ajam vibhum.
अर्थ: जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक हैं, हाथों में खड्ग, तूणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसों के संहार तथा अपनी लीला से जगत की रक्षा हेतु प्रकट हुए हैं, उन श्रीराम का स्मरण करके...

४. रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्। शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥
Raama-rakshaam pathet-praagyah paapa-ghneem sarva-kaamadaam, Shiro me Raaghavah paatu bhaalam Dasharathaatmajah.
अर्थ: मैं सर्वकामप्रद और पापों को नष्ट करने वाले राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता हूँ। राघव मेरे सिर की और दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें।

५. कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती। घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥
Kausalyeyo drishau paatu Vishwaamitra-priyah shrutee, Ghraanam paatu makhatraataa mukham Saumitri-vatsalah.
अर्थ: कौशल्या-नंदन मेरे नेत्रों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञ-रक्षक मेरी घ्राण (नाक) की, और सुमित्रा के वत्सल मेरे मुख की रक्षा करें।

६. जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवंदितः। स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥
Jihvaam Vidyaanidhih paatu kantham Bharata-vanditah, Skandhau divyaayudhah paatu bhujau Bhagnesha-kaarmukah.
अर्थ: विद्यानिधि मेरी जिह्वा की, भरत-वंदित कंठ की, दिव्यायुध कंधों की, और शिवजी का धनुष तोड़ने वाले भगवान श्रीराम मेरी भुजाओं की रक्षा करें।

७. करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्। मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥
Karau Seetaapatih paatu hridayam Jaamadagnya-jit, Madhyam paatu Khara-dhwamsee naabhim Jaambavad-aashrayah.
अर्थ: सीतापति मेरे हाथों की, परशुराम को जीतने वाले हृदय की, खर राक्षस के वधकर्ता मध्य भाग की, और जांबवान के आश्रयदाता नाभि की रक्षा करें।

८. सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः। ऊरू रघुत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥
Sugreeveshah katee paatu sakthinee Hanumat-prabhuh, Uroo Raghuttamah paatu rakshah-kula-vinaashakrit.
अर्थ: सुग्रीव के स्वामी मेरी कमर की, हनुमान के प्रभु हड्डियों की, और राक्षस-कुल का विनाश करने वाले रघुश्रेष्ठ मेरी जंघाओं की रक्षा करें।

९. जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः। पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥
Jaanunee setukrit-paatu janghe Dashamukhaantakah, Paadau Vibheeshana-shreedah paatu Raamo-akhilam vapuh.
अर्थ: सेतु बनाने वाले मेरे घुटनों की, रावण का वध करने वाले जंघाओं की, विभीषण को ऐश्वर्य देने वाले चरणों की, और श्रीराम मेरे संपूर्ण शरीर की रक्षा करें।

१०. एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्। स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥
Etaam Raama-balopetaam rakshaam yah sukritee pathet, Sa chiraayuh sukhee putree vijayee vinayee bhavet.
अर्थ: जो पुण्यवान भक्त श्रद्धा से इस राम-बल से युक्त रक्षा स्तोत्र का पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता है।
॥ स्तोत्र माहात्म्य ॥
यह स्तोत्र सिर से पैर तक शरीर के हर अंग को श्रीराम के किसी न किसी नाम से जोड़ता है — मानो भक्त स्वयं राम-नाम के कवच में लिपटा हो।

श्लोक ११ से २० (राम-नाम की महिमा एवं कवच)

११. पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥
Paataala-bhootala-vyoma-chaarinash-chhadma-chaarinah, Na drashtum-api shaktaas-te rakshitam Raama-naamabhih.
अर्थ: पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरने वाले या छद्म वेश में घूमने वाले जीव, राम-नाम से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं पाते।

१२. रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्। नरो न लिप्यते पापैः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥
Raameti Raamabhadreti Raamachandreti vaa smaran, Naro na lipyate paapaih bhuktim muktim cha vindati.
अर्थ: राम, रामभद्र अथवा रामचंद्र नामों का स्मरण करने वाला मनुष्य पापों से लिप्त नहीं होता, बल्कि भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता है।

१३. जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः॥
Jagaj-jetraika-mantrena Raama-naamnaa-abhirakshitam, Yah kanthe dhaarayet-tasya karasthaah sarva-siddhayah.
अर्थ: जो जगत पर विजय दिलाने वाले राम-नाम मंत्र से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता है, उसे संपूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

१४. वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम्॥
Vajra-panjara-naamedam yo Raama-kavacham smaret, Avyaahataagyah sarvatra labhate jaya-mangalam.
अर्थ: जो वज्रपंजर नामक इस राम-कवच का स्मरण करता है, उसकी आज्ञा कभी नहीं टलती और उसे सर्वत्र विजय व मंगल की प्राप्ति होती है।

१५. आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः॥
Aadishtavaan-yathaa swapne Raama-rakshaam-imaam Harah, Tathaa likhitavaan praatah prabuddho Budhakaushikah.
अर्थ: भगवान शंकर ने स्वप्न में यह राम रक्षा स्तोत्र जिस प्रकार बुधकौशिक ऋषि को सुनाया, उसी प्रकार प्रातः जागने पर उन्होंने इसे लिख दिया।

१६. आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्। अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः॥
Aaraamah kalpa-vrikshaanaam viraamah sakala-aapadaam, Abhiraamas-tri-lokaanaam Raamah shreemaan sa nah prabhuh.
अर्थ: जो कल्पवृक्षों के उद्यान समान विश्राम देने वाले हैं, समस्त विपत्तियों को दूर करने वाले हैं, तीनों लोकों में परम सुंदर हैं — वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं।

१७. तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ। पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥
Tarunau roopa-sampannau sukumaarau mahaabalau, Pundareeka-vishaalaakshau cheera-krishnaajinaambarau.
अर्थ: जो युवा, रूपवान, सुकुमार, महाबली, कमल के समान विशाल नेत्रों वाले, मुनि-वस्त्र और कृष्ण-मृगचर्म धारण करने वाले हैं...

१८. फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ। पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥
Phala-moolaashinau daantau taapasau brahmachaarinau, Putrau Dasharathasyaitau bhraatarau Raama-Lakshmanau.
अर्थ: जो फल-मूल का आहार करने वाले, संयमी, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं — दशरथ के वे दोनों पुत्र, भाई राम-लक्ष्मण हमारी रक्षा करें।

१९. शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्। रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥
Sharanyau sarva-sattvaanaam shreshthau sarva-dhanushmataam, Rakshah-kula-nihantaarau traayetaam no Raghoottamau.
अर्थ: समस्त प्राणियों को शरण देने वाले, सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, राक्षस-कुल का समूल नाश करने वाले वे रघुश्रेष्ठ हमारी रक्षा करें।

२०. आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्गसङ्गिनौ। रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्॥
Aatta-sajja-dhanushaa vishu-sprishaa vakshayaa shuga-nishanga-sanginau, Rakshanaaya mama Raama-Lakshmanau agratah pathi sadaiva gacchataam.
अर्थ: संधान किए हुए धनुष धारण किए, बाणों से युक्त तूणीर लिए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा के लिए सदैव मेरे आगे-आगे चलें।
॥ स्तोत्र माहात्म्य ॥
"राम" नाम को यहाँ वज्रपंजर कवच कहा गया है — यानी वह सुरक्षा जो न टूटती है, न टलती है, बस निरंतर स्मरण चाहती है।

श्लोक २१ से ३० (राम-नाम स्तवन एवं शरणागति)

२१. संनद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा। गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः॥
Sannaddhah kavachee khadgee chaapa-baana-dharo yuvaa, Gacchan-manoratho-asmaakam Raamah paatu sa-Lakshmanah.
अर्थ: सदा तत्पर, कवचधारी, हाथ में खड्ग, धनुष-बाण लिए युवा भगवान राम लक्ष्मण सहित हमारे मनोरथों को पूर्ण करते हुए हमारी रक्षा करें।

२२. रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली। काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः॥
Raamo Daasharathih shooro Lakshmanaanucharo balee, Kaakutsthah purushah poornah Kausalyeyo Raghoottamah.
अर्थ: राम, दशरथ-पुत्र, शूरवीर, लक्ष्मण के सखा, बलवान, काकुत्स्थ, पुरुष, पूर्ण, कौशल्या-नंदन, रघुश्रेष्ठ...

२३. वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः। जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः॥
Vedaanta-vedyo yagyeshah puraana-purushottamah, Jaanakee-vallabhah shreemaan-aprameya-paraakramah.
अर्थ: वेदांत से जानने योग्य, यज्ञेश, पुराण-पुरुषोत्तम, जानकी के प्रिय, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रमी — इन नामों का जो नित्य श्रद्धापूर्वक जप करता है...

२४. इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः। अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः॥
Ityetaani japen-nityam mad-bhaktah shraddhayaanvitah, Ashvamedhaadhikam punyam sampraapnoti na samshayah.
अर्थ: वह निश्चित रूप से अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं।

२५. रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्। स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः॥
Raamam doorvaa-dala-shyaamam padmaaksham peeta-vaasasam, Stuvanti naamabhir-divyair-na te samsaarino naraah.
अर्थ: दूर्वादल के समान श्याम वर्ण, कमल-नयन, पीतांबरधारी श्रीराम की जो इन दिव्य नामों से स्तुति करते हैं, वे संसार-चक्र में नहीं पड़ते।

२६. रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्। काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्। राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्। वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्॥
Raamam Lakshmana-poorvajam Raghuvaram Seetaapatim sundaram, Kaakutstham karunaarnavam guna-nidhim vipra-priyam dhaarmikam, Raajendram satya-sandham Dasharatha-tanayam shyaamalam shaanta-moortim, Vande lokaabhiraamam Raghukula-tilakam Raaghavam Raavanaarim.
अर्थ: लक्ष्मण के अग्रज, रघुश्रेष्ठ, सीतापति, सुंदर, करुणा के सागर, गुण-निधान, विप्र-प्रिय, धार्मिक, राजेन्द्र, सत्यनिष्ठ, दशरथ-पुत्र, श्यामल, शांतमूर्ति, संपूर्ण लोकों में सुंदर, रघुकुल-तिलक, रावण के शत्रु श्रीराम की मैं वंदना करता हूँ।

२७. रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥
Raamaaya Raamabhadraaya Raamachandraaya vedhase, Raghunaathaaya naathaaya Seetaayaah pataye namah.
अर्थ: राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधाता-स्वरूप, रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजी के स्वामी को मेरा नमन।

२८. श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम। श्रीराम राम भरताग्रज राम राम। श्रीराम राम रणकर्कश राम राम। श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥
Shreeraama raama Raghunandana raama raama, Shreeraama raama Bharataagraja raama raama, Shreeraama raama rana-karkasha raama raama, Shreeraama raama sharanam bhava raama raama.
अर्थ: हे रघुनंदन राम! हे भरत के अग्रज राम! हे रणधीर राम! हे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! आप मुझे शरण दीजिए।

२९. श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि। श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि। श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि। श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥
Shree-Raamachandra-charanau manasaa smaraami, Shree-Raamachandra-charanau vachasaa grinaami, Shree-Raamachandra-charanau shirasaa namaami, Shree-Raamachandra-charanau sharanam prapadye.
अर्थ: मैं मन से श्रीरामचंद्र के चरणों का स्मरण करता हूँ, वाणी से गुणगान करता हूँ, सिर झुकाकर नमन करता हूँ, और उन्हीं चरणों की शरण लेता हूँ।

३०. माता रामो मत्पिता रामचंद्रः। स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्रः। सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुः। नान्यं जाने नैव जाने न जाने॥
Maataa Raamo mat-pitaa Raamachandrah, Swaamee Raamo mat-sakhaa Raamachandrah, Sarvasvam me Raamachandro dayaaluh, Naanyam jaane naiva jaane na jaane.
अर्थ: राम मेरी माता, मेरे पिता, मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं। दयालु रामचंद्र ही मेरा सर्वस्व हैं — उनके सिवा मैं किसी और को नहीं जानता, नहीं जानता, नहीं जानता।
॥ स्तोत्र माहात्म्य ॥
"माता रामो मत्पिता रामचंद्रः" — यह श्लोक शरणागति की पराकाष्ठा है, जहाँ भक्त राम में ही अपने हर रिश्ते को देख लेता है।

श्लोक ३१ से ३८ (हनुमद्वंदन एवं फलश्रुति)

३१. दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा। पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्॥
Dakshine Lakshmano yasya vaame tu Janakaatmajaa, Purato Maarutir-yasya tam vande Raghunandanam.
अर्थ: जिनके दाहिनी ओर लक्ष्मण, बायीं ओर जानकीजी और सामने हनुमानजी विराजमान हैं, उन्हीं रघुनंदन की मैं वंदना करता हूँ।

३२. लोकाभिरामं रनरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये॥
Lokaabhiraamam rana-ranga-dheeram raajeeva-netram Raghuvamsha-naatham, Kaarunya-roopam karunaakaram tam Shree-Raamachandram sharanam prapadye.
अर्थ: लोकप्रिय, रणक्षेत्र में धीर, कमल-नयन, रघुवंश के नाथ, करुणा-स्वरूप, करुणा के सागर श्रीरामचंद्र की मैं शरण लेता हूँ।

३३. मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
Manojavam maaruta-tulya-vegam jitendriyam buddhimataam varishtham, Vaataatmajam vaanara-yootha-mukhyam Shree-Raama-dootam sharanam prapadye.
अर्थ: मन के समान गति वाले, वायु के समान वेगवान, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवन-पुत्र, वानरों के प्रमुख, श्रीराम-दूत हनुमान की मैं शरण लेता हूँ।

३४. कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्। आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्॥
Koojantam Raama-Raameti madhuram madhuraaksharam, Aaruhya kavitaa-shaakhaam vande Vaalmeeki-kokilam.
अर्थ: कविता की डाल पर बैठकर मधुर "राम-राम" कूकने वाले वाल्मीकि रूपी कोयल की मैं वंदना करता हूँ।

३५. आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥
Aapadaam-apahartaaram daataaram sarva-sampadaam, Lokaabhiraamam Shree-Raamam bhooyo bhooyo namaamyaham.
अर्थ: समस्त आपदाओं को दूर करने वाले, सभी संपदाएँ देने वाले, लोकप्रिय श्रीराम को मैं बार-बार नमन करता हूँ।

३६. भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्। तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्॥
Bharjanam bhava-beejaanaam-arjanam sukha-sampadaam, Tarjanam Yamadootaanaam Raama-Raameti garjanam.
अर्थ: "राम-राम" की गर्जना जन्म-मृत्यु के बीज को भूनने वाली, सुख-संपदा दिलाने वाली, और यमदूतों को भयभीत करने वाली है।

३७. रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे। रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः। रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम्। रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥
Raamo raaja-manih sadaa vijayate raamam Ramesham bhaje, Raamenaabhihataa nishaachara-chamoo Raamaaya tasmai namah, Raamaan-naasti paraayanam parataram Raamasya daaso-smyaham, Raame chitta-layah sadaa bhavatu me bho Raama maam-uddhara.
अर्थ: राजाओं में श्रेष्ठ राम सदा विजयी होते हैं। मैं लक्ष्मीपति राम का भजन करता हूँ। राक्षस-सेना का नाश करने वाले उन राम को नमन। राम से बढ़कर कोई आश्रयदाता नहीं, मैं उनका दास हूँ। मेरा चित्त सदा राम में ही लीन रहे — हे राम, मेरा उद्धार करें।

३८. राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥
Raama raameti raameti rame raame manorame, Sahasranaama tat-tulyam Raama-naama varaanane.
अर्थ: (शिवजी पार्वती से कहते हैं) हे सुमुखी! राम-नाम विष्णु-सहस्रनाम के समान है। मैं सदा राम का स्तवन करता हूँ और राम-नाम में ही रमण करता हूँ।

॥ इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्॥
Iti Shree-Budhakaushika-virachitam Shree-Raama-Raksha-Stotram sampoornam.
अर्थ: इस प्रकार बुधकौशिक द्वारा रचित श्री राम रक्षा स्तोत्र संपूर्ण होता है।

॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु॥

श्री राम रक्षा स्तोत्र के लाभ

स्तोत्र स्वयं बताता है कि इसका नियमित पाठ करने वाला दीर्घायु, सुखी, विजयी और विनयशील होता है (श्लोक १०), उसे अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य प्राप्त होता है (श्लोक २४), और वह जीवन के हर संकट से सुरक्षित रहता है (श्लोक ११)। यही कारण है कि इसे परंपरागत रूप से नई यात्रा, नए कार्य या भय के समय प्रातःकाल स्नान के बाद पाठ करने की सलाह दी जाती है।

श्री राम रक्षा स्तोत्र — Full Audio

Anuradha Paudwal Version

निष्कर्ष

श्री राम रक्षा स्तोत्र केवल एक पाठ नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव द्वारा दिया गया एक कवच है — जो भक्त के शरीर के हर अंग को श्रीराम के नाम से घेर लेता है। Anuradha Paudwal की आवाज़ में इसे सुनना मन को वही स्थिरता देता है जो सदियों से भक्तों को मिलती आई है। इसे प्रातःकाल स्नान के बाद श्रद्धापूर्वक पढ़ें, या केवल सुनें — दोनों ही रूप में यह स्तोत्र सुरक्षा और शांति का वरदान देता है। इसे अपने रामभक्त परिवार और मित्रों के साथ ज़रूर share करें। 🙏 जय श्री राम! श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु! 🏹