रथ यात्रा के इस पावन पर्व पर, जब पुरी की गलियों में लाखों कंठों से एक ही स्वर गूंजता है — भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने भक्तों के बीच स्वयं चलकर आते हैं। श्री जगन्नाथ चालीसा इसी भक्ति-भाव की अभिव्यक्ति है — इसमें जगन्नाथ की महिमा के साथ-साथ उनकी वे कथाएं भी पिरोई गई हैं जो सदियों से भक्तों के मन में बसी हैं: एक दासी का श्रीफल, कर्मा बाई की खिचड़ी, जयदेव का अधूरा गीत गोविंद — हर कथा यही कहती है कि जगन्नाथ के दरबार में भक्ति ही सबसे बड़ा मोल है।
आगे की चौपाइयों में जगन्नाथ के धाम — शंख क्षेत्र, नीलगिरी और सागर तट पर पुरी — का वर्णन है, और यह भी कि उनके दर्शन के बिना कोई भी तीर्थ यात्रा अधूरी मानी जाती है।
इस चालीसा की खास बात है इसमें गुंथी भक्ति-कथाएं — एक भक्त द्वारा अर्पित साग-भात को प्रेम से ग्रहण करना, एक दासी को श्रीफल चढ़ाने पर मिला वरदान, और भूखे भक्त-परिवार के लिए स्वयं भगवान का स्वर्ण थाल में भोजन ले आना — ये सभी प्रसंग दिखाते हैं कि जगन्नाथ भक्त का भाव देखते हैं, उसकी हैसियत नहीं।
जयदेव द्वारा "गीत गोविंद" की रचना अधूरी छूटने पर स्वयं प्रभु का कवि-रूप धरकर पंक्ति पूर्ण करना, और कर्मा बाई की खिचड़ी प्रेम से खाना — यह चालीसा बार-बार दोहराती है कि "जात पात का भेद ना कोई" — जगन्नाथ के दरबार में केवल प्रेम और भक्ति ही मोल रखते हैं।
अंत में संत कबीरा का उल्लेख भी आता है, जिनके लिए हर भक्त जगन्नाथ को उतना ही प्रिय था। समापन दोहे में कृष्ण-बलराम के साथ सुभद्रा और नीलांचल-वासी जगन्नाथ से सदा हृदय में बसने की प्रार्थना की गई है।
यह चालीसा विशेष रूप से रथ यात्रा महोत्सव, पुरी जगन्नाथ मंदिर की आरती के समय, और घर में नियमित भक्ति-पाठ के रूप में गाई जाती है।
🙏 जय जगन्नाथ! जय जय जगन्नाथ! 🙏
🎵 SONG DETAILS
भजन का नाम — श्री जगन्नाथ चालीसा
By- BABLA MEHTA
Channel - T-Series Bhakti Sagar
Lyrics — Traditional
देवता — भगवान श्री जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा (नीलांचल/पुरी वासी)
थीम — जगन्नाथ चालीसा | रथ यात्रा विशेष | संकट हरण स्तुति
भजन का नाम — श्री जगन्नाथ चालीसा
By- BABLA MEHTA
Channel - T-Series Bhakti Sagar
Lyrics — Traditional
देवता — भगवान श्री जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा (नीलांचल/पुरी वासी)
थीम — जगन्नाथ चालीसा | रथ यात्रा विशेष | संकट हरण स्तुति
श्री जगन्नाथ चालीसा — Lyrics in Hindi
॥ दोहा ॥
श्री जगन्नाथ जगत गुरु, आस भगत के आप।
नाम लेते ही आपका, मिटे कष्ट संताप॥
मैं अधम हूँ मूढ़ मति, पूजा विधि का ना ज्ञान।
दोष मेरा ना धरना नाथ, मैं हूँ तेरी संतान॥
॥ चालीसा ॥
जय जगन्नाथ जगत के पालक,
भव भय भंजन कष्ट निवारक।
संगी साथी, आसरा उसका,
बस एक तू ही, जय जगन्नाथ! जय जय जगन्नाथ!
भगतों के दुःख दूर करे तू,
संतों के सदा मन में बसे तू।
पतित पावन नाम तिहारा,
सारे जग में तू इक प्यारा।
शंख क्षेत्र में धाम है तेरा,
पीड़ हरे है नाम तिहारा।
सागर तट में नीलगिरी पर,
तूने बसा लिया अपना घर।
जो तेरे रूप को मन में बसाये,
चिंता जग की ना उसे सताये।
तेरी शरण में जो भी आये,
विपदा से तू उसे बचाये।
धाम तेरा हर धाम से न्यारा,
जिसके बिना है तीर्थ अधूरा।
ना हो जब तक तेरे दर्शन,
निष्फल जीवन और तीर्थाटन।
हाथ पैर नहीं है प्रभु तेरे,
फिर भी सबको तेरा ही आसरा।
नाथ जगत का तू कहलाता,
हर कोई तेरी महिमा गाता।
भगतों को तू सदा लुभाता,
महिमा अपनी उनसे गवाता।
दासी या भगत था एक अनोखा,
रूप तेरा साग भात में देखा।
अपने बगीचे से श्रीफल तोड़ा,
दे ब्राह्मण को हाथ वो जोड़ा।
जा रहे प्रभु का करने दर्शन,
श्रीफल ये कर देना अर्पण।
अनहोनी ऐसी हुई भाई,
प्रभु ने बांहें अपनी बढ़ाई।
हाथ से विप्र के ले नारियल,
दासिया को दिया भक्ति का फल।
बंधु महंती की भक्ति कहें क्या,
प्रभु को मित्र सा प्यारा वो था।
दर्श की आस तेरे ले मन में,
आया तेरी पुनीत नगर में।
संग में लाया कुटुंब था अपना,
पहुंचा तुझ तक जब हुई रैना।
सिंह द्वार मंदिर का बंद था,
भूखे पेट बंधु सोया था।
भगत का कष्ट ना सह पाये भगवान,
स्वर्ण थाल में लाये भोजन।
साल वेग पूत मुगल पिता का,
नाम तेरा हर पल लेता था।
रथ यात्रा में आ पाये ना पुरी,
सैंकड़ों कोस की थी जो दूरी।
गुहार लगाई जगन्नाथ को,
आऊं ना जब तक रोकना रथ को।
सारा जग तब चकित हुआ था,
भक्त की इच्छा जब पूर्ण हुआ था।
डूबे जय देव भक्ति में तेरे,
गीत गोविंद रचा नाम में तेरे।
लिखते लिखते कवि ठहर गये,
रचना पूर्ण कौन कर पाये।
पत्नी से कहा स्नान कर आऊं,
आकर फिर से बुद्धि लगाऊं।
रूप कवि का धरा प्रभु ने,
गीत अधूरा किया पूर्ण प्रभु ने।
प्रेम से भक्त के प्रभु बंधे हैं,
भक्ति प्रीति के डोर से जुड़े हैं।
बिना मोल के प्यार से बिकता,
कर्मा बाई की खिचड़ी खाता।
जात पात का भेद ना कोई,
जो तुझे देखा सुध बिसराई।
शंकर देव निराकार उपासक,
देख तुझे बने तेरे स्थापक।
श्री गुरु नामक संत कबीरा,
हर कोई तुझको एक सा प्यारा।
तुम से प्रभु कोई और कहाँ है,
भक्त जहाँ है तू भी वहाँ है।
भक्तों के मन को हर्षाने,
रथ पर आता दर्शन देने।
पाकर प्यारे प्रभु का दर्शन,
कर लो धन्य सभी ये जीवन।
जय जगन्नाथ प्रेम से बोलो,
अमृत नाम का कहे कुंदन पी लो।
॥ समापन दोहा ॥
कृष्ण बलराम दोनों ओर, बीच सुभद्रा बहन।
नीलांचल वासी जगन्नाथ, सदा बसो मेरे मन॥
Shree Jagannath Chalisa — Lyrics in English (Roman / Hinglish)
|| Doha ||
Shree Jagannath jagat guru, aas bhagat ke aap,
Naam lete hi aapka, mite kasht santaap.
Main adham hoon moodh mati, pooja vidhi ka na gyan,
Dosh mera na dharna Nath, main hun teri santaan.
|| Chalisa ||
Jai Jagannath jagat ke paalak,
Bhav bhay bhanjan kasht nivaarak.
Sangi saathi, aasra uska,
Bas ek tu hi, Jai Jagannath! Jai Jai Jagannath!
Bhagton ke dukh door kare tu,
Santon ke sadaa mann mein base tu.
Patit paawan naam tihara,
Saare jag mein tu ik pyara.
Shankh shetra mein dhaam hai tera,
Peedh hare hai naam tihara.
Saagar tat mein Neelgiri par,
Tune basaa liya apna ghar.
Jo tere roop ko mann mein basaaye,
Chinta jag ki na use sataaye.
Teri sharan mein jo bhi aaye,
Vipda se tu use bachaaye.
Dhaam tera har dhaam se nyaara,
Jiske binha hai teerth adhoora.
Na ho jab tak tere darshan,
Nishphal jeevan aur teerthaatan.
Haath pair nahin hai prabhu tere,
Phir bhi sabko tera hi aasra.
Naath jagat ka tu kehlata,
Har koi teri mahima gata.
Bhagton ko tu sadaa lubhata,
Mahima apni unse gavata.
Dasi ya bhagat tha ek anokha,
Roop tera saag bhaat mein dekha.
Apne bagiche se shriphal toda,
De brahman ko haath wo joda.
Jaa rahe prabhu ka karne darshan,
Shriphal ye kar dena arpan.
Anhoni aesi hui bhaai,
Prabhu ne baanhe apni badhaai.
Haath se vipr ke le naariyala,
Daasiya ko diya bhakti ka phal.
Bandhu mahanti ki bhakti kahein kya,
Prabhu ko mitra sa pyara wo tha.
Darsh ki aas tere le mann mein,
Aaya teri puneet nagar mein.
Sang mein laya kutumb tha apna,
Pahuncha tujh tak jab hui raina.
Singh dwaar mandir ka band tha,
Bhookhe pet bandhu soya tha.
Bhagat ka kasht na sah paaye Bhagwan,
Swarna thaal mein laaye bhojan.
Saal veg poot Mugal pita ka,
Naam tera har pal leta tha.
Rath yatra mein aa paaye na Puri,
Sainkdo kos ki thi jo doori.
Guhaar lagaai Jagannath ko,
Aaun na jab tak rokna rath ko.
Sara jag tab chakit hua tha,
Bhakt ki iccha jab poorna hua tha.
Doobe Jaydev bhakti mein tere,
Geet Govind racha naam mein tere.
Likhte likhte kavi thahar gaye,
Rachna poorna kaun kar paaye.
Patni se kaha snaan kar aaun,
Aakar phir se buddhi lagaaun.
Roop kavi ka dhara prabhu ne,
Geet adhoora kiya poorna prabhu ne.
Prem se bhakt ke prabhu bandhe hain,
Bhakti preeti ke dor se jude hain.
Bina mol ke pyaar se bikta,
Karma baai ki khichdi khaata.
Jaat paat ka bhed na koi,
Jo tujhe dekha sudh bisraai.
Shankar Dev niraakaar upaasak,
Dekh tujhe bane tere sthaapak.
Shree Guru naamak sant Kabira,
Har koi tujhko ek sa pyara.
Tum se prabhu koi aur kahan hai,
Bhakt jahan hai tu bhi wahan hai.
Bhakton ke mann ko harshaane,
Rath par aata darshan dene.
Paakar pyaare prabhu ka darshan,
Kar lo dhanya sabhi yeh jeevan.
Jai Jagannath prem se bolo,
Amrit naam ka kahe kundan pee lo.
|| Samapan Doha ||
Krishna Balram dono or, beech Subhadra bahan,
Nilaanchal vaasi Jagannath, sada baso mere mann.
चालीसा का अर्थ – Shree Jagannath Chalisa Meaning
प्रारंभ का दोहा एक विनम्र प्रार्थना है — भक्त स्वयं को "अधम" और "मूढ़ मति" कहकर स्वीकार करता है कि उसे पूजा-विधि का पूरा ज्ञान नहीं, फिर भी वह जगन्नाथ की संतान होने के नाते उनकी शरण में है।आगे की चौपाइयों में जगन्नाथ के धाम — शंख क्षेत्र, नीलगिरी और सागर तट पर पुरी — का वर्णन है, और यह भी कि उनके दर्शन के बिना कोई भी तीर्थ यात्रा अधूरी मानी जाती है।
इस चालीसा की खास बात है इसमें गुंथी भक्ति-कथाएं — एक भक्त द्वारा अर्पित साग-भात को प्रेम से ग्रहण करना, एक दासी को श्रीफल चढ़ाने पर मिला वरदान, और भूखे भक्त-परिवार के लिए स्वयं भगवान का स्वर्ण थाल में भोजन ले आना — ये सभी प्रसंग दिखाते हैं कि जगन्नाथ भक्त का भाव देखते हैं, उसकी हैसियत नहीं।
जयदेव द्वारा "गीत गोविंद" की रचना अधूरी छूटने पर स्वयं प्रभु का कवि-रूप धरकर पंक्ति पूर्ण करना, और कर्मा बाई की खिचड़ी प्रेम से खाना — यह चालीसा बार-बार दोहराती है कि "जात पात का भेद ना कोई" — जगन्नाथ के दरबार में केवल प्रेम और भक्ति ही मोल रखते हैं।
अंत में संत कबीरा का उल्लेख भी आता है, जिनके लिए हर भक्त जगन्नाथ को उतना ही प्रिय था। समापन दोहे में कृष्ण-बलराम के साथ सुभद्रा और नीलांचल-वासी जगन्नाथ से सदा हृदय में बसने की प्रार्थना की गई है।
यह चालीसा विशेष रूप से रथ यात्रा महोत्सव, पुरी जगन्नाथ मंदिर की आरती के समय, और घर में नियमित भक्ति-पाठ के रूप में गाई जाती है।
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